गाय और आस्था

गाय को “गोधन” कहा जाता रहा है

गाय को “गोधन” कहा जाता रहा है

भारतीय विज्ञान की दिशा अंदर से बाहर की ओर है । आधुनिक विज्ञान बाह्य घटनाओं के निरीक्षण व प्रयोग के द्वारा उसमें छिपे सत्य को पहचानने का प्रयत्न करता है । हिन्दू विज्ञान सूक्ष्म से स्थूल की ओर ले जाता है तो आधुनिक विज्ञान ठोस स्थूल के माध्यम से विश्लेषण व निष्कर्ष की विधि द्वारा सूक्ष्म को पकडने का प्रयास कर रहा है । इस मूलभूत भेद को समझने से हम भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि का सही विकास कर सकते हैं । फिर हम अपने अज्ञान के कारण ॠषियों द्वारा स्थापित परम्पराओं को अन्धविश्वास के रूप में नकारने के स्थान पर उनमें छिपे गूढ तत्व को समझने का प्रयत्न करेंगे । गाय को भारतीय जीवन में दिये जाने वाले महत्व को

गोदान से ही सभी अरिष्ट कट जाते हैं।

गोदान से ही सभी अरिष्ट कट जाते हैं।

 नवग्रहों की शांति के संदर्भ में गाय
की विशेष भूमिका होती है कहा तो यह
भी जाता है कि गोदान से
ही सभी अरिष्ट कट जाते हैं।
शनि की दशा, अंतरदशा, और साढेसाती के
समय काली गाय का दान मनुष्य को कष्ट मुक्त कर
देता है।
2. मंगल के अरिष्ट होने पर लाल वर्ण की गाय
की सेवा और निर्धन ब्राम्हण को गोदान मंगल के प्रभाव
को क्षीण करता है।
3. बुध ग्रह की अशुभता निवारण हेतु
गौवों को हरा चारा खिलाने से बुध की अशुभता नष्ट
होती है।
4. गाय की सेवा, पूजा, आराधना, आदि से
लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं

मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है ।

मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है ।

गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है।

मनुष्य तभी जब वह अहिंसा आदि गुणों का पूर्णतया पालन करें’

योगदर्शन महर्षि पतंजलि की मनष्यों को बहुत बड़ी देन है जो मनुष्यों को मनुष्य बनाने का प्रमुख साधन है। योगदर्शन का उद्देश्य मनुष्यों को सुसंस्कारित कर उसे समाधि अवस्था तक पहुंचाना और ईश्वर का साक्षात्कार कराना है। समाधि में ही ईश्वर का साक्षात्कार सम्भव है वा होता है। समाधि में ईश्वर साक्षात्कार से विवेक उत्पन्न होता है और यही मनुष्यों के जीवन से दुःखों की पूर्णतः निवृति कराकर ईश्वर के सान्निध्य में पहुंचाता है। इसके बाद मनुष्य जब तक जीवित रहता है जीवनमुक्त कहलाता है और मृत्यु होने के पश्चात अनादि जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करता है जो दुःखों से सर्वथा रहित अतिशय सुख की अवस्था होती है। इस मोक्ष अव

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