गाय और गांव

गोमाता को वचन दे के प्लास्टिक का उपयोग बंद करेगे

गोमाता को वचन दे के प्लास्टिक का उपयोग बंद करेगे

आईये हम सब गोमाता को वचन दे के प्लास्टिक का उपयोग बंद करेगे ।
कोई भी वयक्ति जो प्लास्टिक का उपयोग करता है,गोमाता के लिये किसी हत्यारे से कम नही है।
क्यिोंकी प्लास्टिक खाने के बाद गोमाता के बचने कि संभावना ना के बराबर रहती है।
इसलिये यदि पुण्य नही कमा सकते, कम से कम पाप तो ना कमाये।

गौ सेवा या गौ रक्षा का लोग गलत मतलब निकाल लेते हैँ

गौ सेवा या गौ रक्षा का लोग गलत मतलब निकाल लेते हैँ

गौ सेवा या गौ रक्षा का लोग गलत मतलब निकाल लेते हैँ। इसका मतलब ये नहीँ है कि एक डंडा हाथ मेँ लिया एक कट्टा कमर मेँ फसाया और निकल लिये कसाईयोँ और बूचड़ोँ की खोज मे

चूंकि हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वो अपनी विसंगतियोँ को भी खुले दिल से स्वीकारता है

हमारे साथ यही दिक्कत है कि नागपंचमी पर नाग को दूध पिलायेँगेँ और साल के बाकी दिन जहाँ कहीँ साँप नजर आया फौरन उसे

मार देँगेँ

गौअष्टमी के दिन गाय को ढ़ूंढ कर चारा खिलायेँगेँ और साल के बाकी दिन बैल के घर के पास नजर आते ही डंडा मार के भगायेँगे

गोवंशरक्षा - कल आज और कल

गोवंशरक्षा - कल आज और कल

गोवंशरक्षा - कल आज और कल गोवंश का इतिहास मनुष्य और सृष्टि के प्रारम्भ से शुरु होता है. पृथु मनु ने गोदोहन किया और पुथ्वी पर कृषि का प्रारंभ किया और यह धरा पृथ्वी कहलाई. मानव संरक्षण, कृषि और अन्न उत्पादन में गोवंश का अटूट सहयोग और साथ रहा है. इसही कारण ह्मर्रे शास्त्र वेद पुराण गोमहिमा से भरे है. रघुवंश के रजा दिलीप गोसेवा के पर्याय और राम जन्म सुरभि के दुग्ध द्वारा तैआर खीर से माना गया है यहां तक कि गाय (गोबर) का मलमूत्र एक पर्यावरण रक्षक के रूप में माना जाता था और फर्श और घरों की दीवारों रसोई में इस्तेमाल किया गया था. गोमूत्र शुद्ध करने के लिए हर घर,मानव शरीर में छिड़काव एक आम बात थी.

गौ माता के नाम पर केवल जय

गौ माता

श्री मान पता नहीं आप मेरे तर्क से सहमत होंगे या नहीं परन्तु मेरी धारणा है की, हिन्दू समाज के साधू ,,संत और अदि शंकराचार्य की निष्क्रियता ही समस्त समाज के पतन का कारण है,, चारों शंकराआचार्या जी अपने अपने मठों में मगन हैं,,बाकि के साधू संत अपने अपने आश्रमों में आनंदमयी जीवन व्यतित कर रहे हैं,,कोई धर्म संसद नहीं ,,कोई अनुशान नहीं ,,कोई दिशा निर्देश नहीं,,आज समाज का साधरण मानव गौ रक्षा के लिए जूझ रहा है,,परन्तु इस पुण्य कर्म के लिए साधू और संत समाज का योगदान नाम मात्र को ही मिल रहा है,, जबकि हमारे देश में असंख्य ऐसे मठ भी हैं जिनके पास सैंकढ़ों एकड़ जमीन है,,यदि समस्त साधू समाज चाहे तो एक आव्हा

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