गौभक्त विचार

गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है

गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है

गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है। यह गंगा, गायत्री, गीता, गोवर्धन और गोविन्द की तरह पूज्य है।

प्रभु ---आप तो हर जगह हो -फिर इतना सब्र कैसे ।

प्रभु ---आप तो हर जगह हो -फिर इतना सब्र कैसे ।

प्रभु ---आप तो हर जगह हो -फिर इतना सब्र कैसे ।
क्यों गौ -को माँ का दर्जा देकर -आप बेफिक्र कैसे ।।१-
कितना दुःख -सब्र करेगा हिन्दू -इन कन्सो से ।
बाबर गजनी -अंग्रेज और रावन के इन वन्सो से ।।२-
अब तो सहन नहीं होता है -रात दिन बेचैन किया ।
भारत में -अपनों ,गैरों ने -दुःख अपरम्पार दिया ।।३-
मानवता की हत्या हो रही -दर्द कीसीमा पार हुई ।
जीवन जीना दुर्लभ हो गया -बे पर्दा अब नार हुई ।।४-
लुट मची है धनवानों की -मरता रोज़ गरीब है ।
क्या मै समझू मेरे कृष्णा -कलयुग अंत करीब है ।।५-
कैसे होगा अंत नीच का -राम तुम्हे आना होगा ।

बचालो रे बचालो गाय माता को बचालो

बचालो रे बचालो गाय माता को बचालो

जय गौ माता जय गोपाल
जय श्री राधे राधे.......
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बचालो रे बचालो गाय माता को बचालो 
यही जीवन का प्राण है, यही जीवन का आधार है,
ये नही है कोई जानवर, यह गलत फहमी मिटा के, बचालो रे बचालो गाय माता को बचालो 
गाय माता जब बचेगी, तभी हम भी बचेगे 
गौ की सेवा जब होगी, तभी हम भी सुख शांति से रहेगे
हो......मेरे प्यारे....गौ वत्स बनके गाय माता को बचालो ह
बचालो रे बचालो गाय माता बचालो 
जय गौ माता जय गोपाल

धेनु: सदनम् रचीयाम्

धेनु: सदनम् रचीयाम्

आज यत्र—तत्र—सर्वत्र शाकाहार की चर्चा है किन्तु धर्मप्राण देश भारत, जहां की संस्कृति में गाय को माता तुल्य आदर प्राप्त है, वहां मांसाहार तथा मांसनिर्यात हेतु गो हत्या अत्यन्त शर्मनाक है। अहिल्या माता गोशाला जीव दया मण्डल ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस निबन्ध प्रतियोगिता में सम्पूर्ण देश से ५६ प्रविष्टियाँ प्राप्त हुर्इं थीं। निर्णायक मण्डल ने कु. पटेल के आलेख को प्रथम घोषित किया। जनरुचि का विषय होने तथा शाकाहार के प्रचार में महत्वपूर्ण होने की दृष्टि से अर्हत् वचन के पाठकों के लिये यह आलेख प्रस्तुत है।

धेनु: सदनम् रचीयाम्’’ (अर्थववेद—११.१.३४)

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