गौ - चिकित्सा

गौ - चिकित्सा भाग - 1

१ - थनेला रोग - गाय के थन में गाँठ पड़ जाना व थन मर जाना एेसे मे । अमृतधारा १०-१२ बूँद , एक किलो पानी में मिलाकर ,थनो को दिन मे ३-४ बार धोयें यह क्रिया ५ दिन तक करे । और गाय को एक मुट्ठी बायबिड्ंग व चार चम्मच हल्दी प्रतिदिन देने से लाभ होगा ।एक मसरी की दाल के दाने के बराबर देशी कपूर भी खिलाऐ । २ - कलीली,जूँएँ ,घाव के कीड़े व पेट के कीड़े - एक मुट्ठी हल्दी व एक मुट्ठी बायबिड्ंग प्रतिदिन देने से ५-७ दिन देने से पेट के कीड़े ,घाव के कीड़े , कलीली, जूँएँ , अन्य कीड़े सभी मर जाते है । ३ - थनेला- सीशम के मुलायम पत्ते लेकर बारीक पीसकर सायं के समय थनो पर लेप करें और प्रात: २५० ग्राम नीम की पत्तियाँ

क्या कहते है वैज्ञानिक देशी गौमाता के बारे में ..

1.जर्सी नस्ल की गाय का दूध पीने से 30 प्रतिशत कैंसर बढने की संभावना हैं
- नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट आॅफ अमेरिका

2.गाय अपने सींग के माध्यम से काॅस्मिक पाॅवर ग्रहण करती हैं - रूडल स्टेनर,जर्मन वैज्ञाानिक

3.गोबर की खाद की जगह रासायनिक खाद का उपयोग करने के कारण महिलाओं का दूध दिन प्रतिदिन विषैला होता जा रहा हैं
- डाॅ. विजयलक्ष्मी सेन्टर फाॅर इण्डियन नोलिज सिस्टम

आखिर कौन सा दूध जहर है कौन सा अमृत

कौन सा दूध

आखिर कौन सा दूध जहर है कौन सा अमृत । आज दूध1 प्रत्येक परिवार की जरुरत है दूध2 हमेशा रात को ही पीना चाहिए महर्षि बांगभट्ट जी के अष्टांगहृद् यम ग्रन्थ के हिसाब से दूध को पचाने वाले एंजाइम केवल रात को चन्द्रमा की शीतलता में ही पैदा होते है ।माताये अपने नन्हे मुन्हे बच्चों को सुबह सुबह जबर दस्ती दूध पिलाकर स्कुल भेजती है यह गलत है कई बच्चे तो उलटी भी कर देते है इसलिए बच्चों को को दूध रात को ही देना चहिये तभी संपूर्ण आहार होगा ।

गोपूजन की परम्परा के पीछे प्राणविज्ञान का रहस्य है ।

गोपूजन की परम्परा के पीछे प्राणविज्ञान का रहस्य है ।

गोपूजन की परम्परा के पीछे प्राणविज्ञान का रहस्य है । कहा जाता है कि गाय में तैंतीस करोड देवी-देवता वास करते हैं । सामान्यत: हम देवता का अर्थ ईश्वर के रूपों अथवा अवतारों से लेते हैं किन्तु शास्त्र कुछ और ही बताते हैं । प्रकृति की शक्तियों को देवता कहा जाता है । हमारे अध्यवसायी ॠषियों ने सृष्टि में प्रवाहित जीवनदायी शक्तियों को सम्पूर्णता के साथ जाना । इस शक्ति को ही प्राण कहा जाता है । मूलत: सूर्य से प्राप्त यह महाप्राण सारी सृष्टि में विविधता से प्रवाहित होता है । उसके प्रवाह की गति, दिशा, लय व आवर्तन के भेदों का ॠषियों ने बडी सूक्ष्मता से अध्ययन किया । और इस आधार पर उन्होंने पाया कि ३३ कोट

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