गौ महिमा

गौमाता को कैसे करें प्रसन्न ?

हिंदू धर्म में गौमाता, धेनु, गाय की पवित्रता और महत्व को माना गया है। गाय की सेवा करने से हमारे सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है, सभी प्रकार के सुख मिलते हैं। गाय की पूजा की जाना चाहिए लेकिन यह कम ही लोग जानते हैं गाय को प्रसन्न कैसे किया जाए ? यदि गाय हमारी सेवा से प्रसन्न हो जाती है तो हमारे सभी बिगड़े काम बन जाते हैं और परेशानियां दूर हो जाती हैं। गौमाता की विधिवत पूजा के साथ ही हमें उसे सहलाना चाहिए। गाय की पीठ, मुंह पर हाथ फेरने से गाय अतिप्रसन्न होती है। गाय को घास खिलानी चाहिए। गाय की ऐसी सेवा से वह खुश हो जाती है और हमें आशीर्वाद देती ह

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गौमाता की महिमा

गौ महिमा 

गौ मईया हमारी माता है उनकी बड़ी ही महिमा है वह सभी प्रकार से पूज्य है गौमाता की रक्षा और सेवा सर्वोच्च पुण्य है|

1गौ के शरीर में “३३ करोड़ देवी देवताओ” का वास होता है. गौमाता श्री कृष्ण की परमराध्या है |

2. ऐसा कहा गया है जो तन-मन-धन से गौ की सेवा करता है. तो गौ उसकी सारी मनोकामनाएँ पूरी करती है. |

3. प्रातः काल उठते ही श्री भगवत्स्मरण करने के पश्चात यदि सबसे पहले गौमाता के दर्शन करने को मिल जाये तो इसे अपना सौभाग्य मानना चाहिये |

4. यदि रास्ते में गौ आती हुई दिखे, तो उसे अपने दाहिने से जाने देना चाहिये |

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भारत देश की रीढ़ है गौ माता – साध्वी सुमेधा भारती

साध्वी सुमेधा भारती

अजमल खाँ पार्क, करोल बाग दिल्ली में सात दिवसीय श्री गो कथा के अंतिम दिवस में गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथा व्यास साध्वी सुमेधा भारती जी ने बताया कि आज समय की मांग है कि हम अपने पूर्वजों द्वारा दिखाए रास्ते पर चलें। हमारे भारत देश में जब-जब भी गाय पर अत्याचार हुआ तब-तब गो रक्षक आगे आए। उन्होंने अपने प्राणों की चिंता किए बिना गाय माता को प्रत्येक विपदा से बचाया। भगवान श्री कृष्ण जी ने तो गाय को दावानल से बचाने के लिए अग्नि तक का पान कर लिया था। मंगल पांडे जी ने गोरक्षा के लिए फाँसी के फंदे को भी स्वीकार कर लिया था। महाराज दलीप जी ने गाय के बदले अपने प्राण सिंह को देना उचित समझा

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गोपाअष्ठमी 2017 मुहर्त पूजा विधि ओर महत्व

गोपाष्टमी 2017 : कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के त्यौहार रूप में मनाया जाता है गोपाष्टमी का पर्व गोवर्धन पर्वत से जुड़ा त्यौहार है | श्रीकृष्ण ने गौचारण लीला गोपाष्टमी के दिन शुरू की थी। कहा जाता है की द्वापर युग में श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा को ब्रज वासियों की भारी वर्षा से रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था | श्री कृष्ण भगवान की इस लीला से सभी ब्राज़ वासी उस पर्वत के निचे कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक रहे तब जाकर इन्द्र देव को पछतावा हुआ | और इन्द्र देव को वर्षा रोकनी पड़ी | तब से लेकर आज तक गोवर्धन पर्वत

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