गौ समाचार

जानिए, किस राज्य की सरकार आधुनिक डेयरी के लिए दे रही है ब्याज मुक्त ऋण

आधुनिक डेयरी

हरियाणा में पशुपालन विभाग राज्य के सभी जिलों में आधुनिक डेयरी की स्थापना करेगा। इस डेयरी की स्थापना के लिए लोगों को ब्याज मुक्त ऋण मुहैया कराया जाएगा। इन डेरियों में सब कुछ आधुनिक तरीके से किया जाएगा। गायों से दूध निकालने से लेकर गोबर के उठान तक सब कुछ मशीन आधारित होगा। ताकि गायों की सुरक्षा के साथ-साथ लोगों को जो दूध और घी मिले, वह भी स्वास्थ्यवर्धक हो। योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए विभाग के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी पीके महापात्रा ने राज्य के सभी जिलों में पशुपालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर से संपर्क करना शुरू कर दिया है।

उत्तर प्रदेश: योगी सरकार राज्य के हर गांव में खोलेगी गौशाला, शुरुआत बुंदेलखंड से होगी

उत्तर प्रदेश: योगी सरकार राज्य के हर गांव में खोलेगी गौशाला, शुरुआत बुंदेलखंड से होगी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजनेता के साथ-साथ एक सन्यासी भी हैं। और उनका गायों से प्रेम किसी से छुपा नहीं है. जब से वो संन्यासी बने, गाय को चारा खिलाना और उनकी देखभाल करना उनकी जिंदगी का हिस्सा है. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी ये सिलसिला टूटा नहीं है. जब भी वो गोरखपुर जाते हैं, दिन की शुरुआत गोसेवा से ही होती है. इतना ही नहीं लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर भी उन्होंने गोरखपुर से कई गायों को लाकर रखा है और खुद उनकी देखभाल करते हैं।

सरकार की हर गांव में एक गोशाला खोलने की योजना

गौशाला खोलने के लिए जमीन देंगे

गौशाला खोलने के लिए जमीन देंगे

पिथौरागढ़। गौ रक्षा सेवा सदन के उपाध्यक्ष गणेश जोशी ने गौशाला खोलने के लिए बड़ावे में जमीन देने की घोषणा की है। समिति ने जमीन समतलीकरण और भवन के निर्माण के लिए चंदा मांगने का निर्णय लिया है। इसके लिए बैंक में संयुक्त खाता खोला जाएगा। 

10 राज्यों में क़ानूनन होती है गो-हत्या

भारत के 29 में से 10 राज्य ऐसे हैं जहां गाय, बछड़ा, बैल, सांड और भैंस को काटने और उनका गोश्त खाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. बाक़ि 18 राज्यों में गो-हत्या पर पूरी या आंशिक रोक है.

भारत की 80 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी हिंदू है जिनमें ज़्यादातर लोग गाय को पूजते हैं. लेकिन ये भी सच है कि दुनियाभर में ‘बीफ़’ का सबसे ज़्यादा निर्यातकरनेवाले देशों में से एक भारत है.

दरअसल ‘बीफ़’, बकरे, मुर्ग़े और मछली के गोश्त से सस्ता होता है. इसी वजह से ये ग़रीब तबक़ों में रोज़ के भोजन का हिस्सा है, ख़ास तौर पर कई मुस्लिम, ईसाई, दलित और आदिवासी जनजातियों के बीच.

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