सात्विक जीवन

सात्विक जीव

किसी व्यक्ति या प्राणी को तभी सात्विक कहा जा सकता है जब उस प्राणी की प्रवृत्ति मुख्यतः सात्विक हो. "सात्विक" नाम का अर्थ दैवीय, शुद्ध और आध्यात्मिक लोगों से है।

सत्त्व मन की एक अवस्था है जिसमें मन स्थिर, शांत और शांतिपूर्ण होता है।

हिन्दू दर्शन में, सत्त्व ,सांख्य दर्शन में वर्णित तीन गुणों में से एक है। अन्य दो गुण हैं - रजस् और तमस् । सत्वगुण का अर्थ 'पवित्रता' है।

शाब्दिक अर्थ : "अस्तित्व, वास्तविकता"

विशेषण : सात्विक

सात्त्विक वस्तुएं

किसी वस्तु या भोजन के  सात्त्विक होने के लिए, उसे पवित्र होना चाहिए .अपनी उपस्थिति से वातावरण को शुद्ध करना चाहिए. भोजन को स्वस्थ, पौष्टिक और साफ होना चाहिए, किसी प्राणी को मारकर या दर्द देकर प्राप्त भोजन हमारे विनाश का कारण बन जाता है. यह बासी और तीखी महक वाले खाद्य से दूर रहना चाहिए.

हम जैसा अन्न खाते हैं हमारे विचार भी वैसे ही हो जाते हैं। इसलिए हमें अपने शरीर की क्षमता के अनुसार सात्विक भोजन करना चाहिए। इससे शरीर भी स्वस्थ रहेगा और मस्तिष्क भी शांत।

कुछ वस्तुएं जिन्हें सात्त्विक माना जाता है, वे हैं:

•           फूल, फल और खाद्य जिन्हें भगवान को प्रसाद के रूप में चढ़ाने की अनुमति दी जाती है, नीम का पेड़

•           उस गाय का दूध जिसका पालन-पोषण अच्छे वातावरण में हुआ है, जो स्वस्थ है और जिसका दूध तब निकाला गया गाय के बछड़े ने पेट भर दूध पी लिया। ऐसे मामलों में जब गाय के साथ खराब व्यवहार किया जाता है, तो ऐसे दूध का सेवन पाप या बुरा हो जाता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिंदुओं के लिए गाय पवित्र है।

•           प्रकृति ने हमेशा सात्त्विक होने के संकेत दिए हैं। इसी वजह से, हिंदू दर्शन ने पशुओं के भक्षण, या प्रकृति और उसके निवास के विनाश को प्रोत्साहित नहीं किया है।

विचार ही कर्म का आधार...

मनुष्य जैसा संकल्प करने लगता है, वैसा ही आचरण करता है और जैसा आचरण करता है फिर वैसा ही बन जाता है। जिन बातों का बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती है.

अहंकार और क्रोध से नष्ट होते हैं सात्विक विचार

अहंकार पतन का कारण है, रावण हो या कंस सभी को अहम के चलते पतित होना पड़ा। यही नहीं अपनी शक्ति के मद में चूर इंद्र देव को भी नीचा देखना पड़ा। अहंकार से मन के सात्विक विचार नष्ट हो जाते हैं और तामसिक विचार से ग्रसित मनुष्य अपने को ही नष्ट करने का आमंत्रण देता है।

ज्ञानी रावण का अहम उसके ही काल का कारण बना।

एक सात्विक व्यक्ति हमेशा वैश्विक कल्याण के निमित्त काम करता है। हमेशा मेहनती, सतर्क होता है और औसत दर्जे का जीवन जीता है। एक पवित्र जीवनयापन करता है। शुद्ध भोजन  करता है। सच बोलता है और साहसी होता है। प्रशंसा करता है और सटीक भाषा का प्रयोग करता है। ईर्ष्या महसूस नहीं करता और लालच और स्वार्थ से दूर होता है . आत्मविश्वास, और उदारता को महसूस करता है। किसी को धोखा नहीं देता या गुमराह नहीं करता है। जो होता है वही दर्शाता है | किसी शैतानी प्रवृत्ति को मन में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देता है। दुनिया में आंतरिक अच्छाई के प्रसार का समर्थन करता है। अच्छी स्मृति और एकाग्रता रखता है। इसके अलावा आध्यात्मिक ज्ञान में सुधार करने में गहरी रुचि रखता है और देवत्व की पूजा या ध्यान में समय बिताता है। चरम अवस्था में तपस्या या निरंतर ध्यान करता है। एक सात्विक व्यक्ति को तभी पहचाना जा सकता है जब उसके मन वाणी और कार्यों में तालमेल हो।