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हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार गाय के गोबर में लक्ष्मी और मूत्र में गंगा का वास होता है, जबकि आयुर्वेद में गौमूत्र के ढेरों प्रयोग कहे गए हैं। गौमूत्र का रासायनिक विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया, कि इसमें 24 ऐसे तत्व हैं जो शरीर के विभिन्न रोगों को ठीक करने की क्षमता रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार गौमूत्र का नियमित सेवन करने से कई बीमारियों को खत्म किया जा सकता है। जो लोग नियमित रूप से थोड़े से गौमूत्र का भी सेवन करते हैं, उनकी रोगप्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है। मौसम परिवर्तन के समय होने वाली कई बीमारियां दूर ही रहती हैं। शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है। इसके कुछ गुण इस प्रकार गए हैं  :-

गोसेवा के चमत्कार

जय गौ माता------------- जीवनदान-----------(लेखक - वैध पंचानन के० के० श्रीनिवासाचार्य) -----------
गोसेवा के चमत्कार (सच्ची घटनाएँ
स० १९९१ का आषाढ़ मास था | नोहर (बीकानेर) से लगभग ढेड मील डालूराम महर्षि का जोहंड (तालाब) है | पन्द्रह दिन पहले कुछ वर्षा हुई थी, जिसक कुछ कीचड अवशेष था | एक प्यासी गौ जल की इच्छा से जोहंड में घुसी, परन्तु कीचड़ में घुटनों तक डूब गयी | गौ वृद्धा तो थी ही, निकलने के प्रयास से बेहद थक ही गयी | खड़ा रहना दूभर हो गया | बैठकर कीचड में धसँ गयी |

औद्यौगिकीकरण की आंधी अभी तक इस ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ नहीं पायी थी किन्तु नई आर्थिक नीति के कारण ग्रामीण अर्थनीति को खतरा पैदा हो गया है। ये अपनी विशाल पूंजी और अचूक प्रचारशक्ति से शीघ्र ही भारतीय बाजारों पर पूर्ण अधिकार कर लेंगे और भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने में आत्मसात कर लेंगे। इस विषम परिस्थितियों में गोरक्षा नई जीवन पद्धति को दृष्टि दे सकती है। पूरी अर्थव्यवस्था के परिवर्तन की व्यापक मांग का गाय एक प्रतीक है। उसे ‘गाय बचाओ’ के रूप में देखने जैसा है। गाय भारत की आत्मा है। शरीर में जितना महत्व आत्मा का है वही महत्व गाय का भारत के जीवन में आदिकाल से रहा है और आज भी है| अभ

वेदों में भी इसकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि-

‘‘माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसाऽऽदिव्यानाम मृतस्य नाभि:।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट।।’

अर्थात् गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन और धृतरुप अमृत का खजाना है। गाय परोपकारी एवं वध न करने योग्य है। अथर्ववेद के मंत्रों में भी कहा है कि गाय घर को कल्याण का स्थान बनाती है एवं मनुष्य का पोषण करती है। गाय को ही संपत्ति माना गया है तभी तो भारतीय राजाओं की गोशालाऐं असंख्य गायों से भरी रहती थीं।

वैदिक काल में समद्ध खेती का मुख्य कारण कृषि का गौ आधारित होना था।

वैदिक काल में समद्ध खेती का मुख्य कारण कृषि का गौ आधारित होना था। प्रत्येक घर में गोपालन एवं पंचगव्य आधारित कृषि होती थी, तब हम विश्व गुरू के स्थान पर थे। भारतीय मनीषियों ने संपूर्ण गौवंश को मानव के अस्तित्व, रक्षण, पोषण, विकास एवं संवध्र्रन के लिये आवश्यक समझा और ऐसी व्यवस्थाऐं विकसित की थी जिसमें जन मानस को विशिष्ट शक्ति बल तथा सात्विक वृद्धि प्रदान करने हेतु गौ दुग्ध, खेती के पोषण हेतु गोबर-गौमूत्र युक्त खाद, कृषि कार्याे एवं भार वहन हेतु बैल तथा ग्रामद्योग के अंतर्गत पंचगव्यों का घर-घर में उत्पादन किया जाता था। प्राचीन काल से ही गोपालन भारतीय जीवन शैली व अंर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग रहा

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