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सात्विक जीव

किसी व्यक्ति या प्राणी को तभी सात्विक कहा जा सकता है जब उस प्राणी की प्रवृत्ति मुख्यतः सात्विक हो. "सात्विक" नाम का अर्थ दैवीय, शुद्ध और आध्यात्मिक लोगों से है।

सत्त्व मन की एक अवस्था है जिसमें मन स्थिर, शांत और शांतिपूर्ण होता है।

हिन्दू दर्शन में, सत्त्व ,सांख्य दर्शन में वर्णित तीन गुणों में से एक है। अन्य दो गुण हैं - रजस् और तमस् । सत्वगुण का अर्थ 'पवित्रता' है।

शाब्दिक अर्थ : "अस्तित्व, वास्तविकता"

विशेषण : सात्विक

सात्त्विक वस्तुएं

गौशाला प्रबंधन एवं कार्यों की जानकारी एवं संयोग

श्रीमान सादर नमस्कार।
गौ परिषद राजस्थान एक प्रदेश स्तर की स्वयंसेवी संस्था है। इसके द्वारा गौशाला संबंधित सभी प्रकार की जानकारी निशुल्क उपलब्ध करवाई जाती है जो इस प्रकार हैः-
1. समिति रजिस्ट्रेशन एवं नवीनीकरण, कार्यकारणी चुनाव, समिति के संविधान में संशोधन, समिति का नाम सुधार या नाम परिवर्तन आदि में सहयोग।
2. कार्यवाही लिखना एवं बैठक कार्रवाई लिखने में मदद करना एवं इसके लिए उपयुक्त जानकारी देना, वार्षिक प्रतिवेदन तैयार करने में सहयोग, आवक-जावक रजिस्टर तैयार करवाने में सहयोग, विजिटर बुक तैयार करने में सहयोग आदि।

गौपालन में लगे हुए उद्यमियों को निम्न बिंदूओं का ध्यान रखना आवश्यक है, अन्यथा लाभ में निरंतर कमी आती जाएगी|

क. प्रजनन

(अ) अपनी आय को अधिक दूध वाले सांड के बीज से फलावें ताकि आने वाली संतान अपनी माँ से अधिक दूध देने वाली हो| एक गाय सामान्यत: अपनी जिन्दगी में 8 से 10 बयात दूध देती हैं आने वाले दस वर्षों तक उस गाय से अधिक दूध प्राप्त होता रहेगा अन्यथा आपकी इस लापरवाही से बढ़े हुए दूध से तो आप वंचित रहेंगे ही बल्कि आने वाली पीढ़ी भी कम दूध उत्पादन वाली होगी| अत: दुधारू गायों के बछड़ों को ही सांड बनाएँ|

एक गाय, पांच एकड़ खेती

हींग लगे न फिटकरी, रंग चढ़े चोखा। शून्य लागत पर प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों के लिए यह कहावत सच साबित हो रही है। बिना रासायनिक खाद व कीटनाशक के प्रयोग के सिर्फ गोबर व गोमूत्र के प्रयोग से अनाज व सब्जी का अधिक उत्पादन मिलने लगा है। अपने पास अगर एक गाय है, तो पांच एकड़ तक खेती के लिए खाद की चिंता नहीं रहेगी। बस गोबर और गुड़ से ही फसल लहलहाएगी। गुणवत्तापूर्ण अधिक उत्पादन भी मिलेगा।

वैतरणी दे पार कर, पूजे सब संसार

अंग अंग में देवता, बहे दूध की धार ||
वैतरणी दे पार कर, पूजे सब संसार ||

युगों-युगों से गौमाता
हमें आश्रय देते हुए
हमारा लालन-पालन
करती आ रही है

हमारी जन्मदात्री माँ तो
हमें कुछ ही बरस तक
दूध पिला सकी
परन्तु यह पयस्विनी तो
जन्म से अब तक
हमें पय-पान कराती रही

हमारी इस नश्वर काया
की पुष्टता के पीछे है
उसके चारों थन
जिस बलवान शरीर
पर हमें होता अभिमान
वह विकसित होता
इस गोमाता के समर्पण से

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