गौ आधारित कृषि

विदेशी नस्ल की गाय को गोमाता नहीं कहा जा सकता

विदेशी नस्ल की गाय को भारतीय संस्कृति
की दृष्टि से गोमाता नहीं कहा जा सकता। जर्सी, होलस्टीन, फ्रिजियन, आस्ट्रियन आदि नस्ल की तुलना भारतीय गोवंश से नहीं हो सकती। आधुनिक गोधन जिनेटिकली इंजीनियर्ड है। इन्हें मांस व दूधउत्पादन अधिक देने के लिए सुअर के जींस से बनाया गया है। अधिक दूध की मांग के आगे नतमस्तक होते हुए भारतीय पशु वैज्ञानिकों
ने बजाय भारतीय गायों के संवर्द्धन के विदेशी गायों व नस्लों को आयात कर एक
आसान रास्ता अपना लिया। इसके दीर्घकालिक प्रभाव बहुत ही हानिकारक हो
सकते हैं। आज ब्राजील भारतीय नस्ल
की गायों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया

सामुहिक गौशाला खोलिये

सामुहिक गौशाला

आज जब आदमी 40- 40 हजार रु. की मोटर सायकल खरीद रहा है तब कुछ लोग थोड़ी- थोड़ी रकम लगाकर 10- 15 देशी गाय खरीदकर सामुहिकरूप से एक जगह उनका पालन- पोषण कर सकते हैं ।। अलग- अलग गाय पालने से यह बेहतर है ।। गौसेवा का पुण्य मिलेगा, शुद्ध दूध भी मिलेगा, आप एक परिवार को रोजगार भी दे सकेंगे और चाहे तो गोबर एवं गौ मूत्र से अन्य छोटे उद्योग भी चलाए जा सकते हैं ।। यह सामुहिक प्रयास समाज में सहकारिता, सहयोग और पारिवारिक भावना बढ़ाने वाला भी होगा... तब क्या विचार है... ?? 

गाय के ग्रामीण अर्थशास्त्र

गाय के ग्रामीण अर्थशास्त्र को समझने के लिये ‘गाय’ को केन्द्र में रखें तो उसका नक्शा कुछ ऐसा बनता है:— गाय से घी—दूध, मक्खन, मट्ठा, गाय से खेतों के लिये बैल, गाय—बैल से खेतों के लिये खाद, परिवहन के लिये बैलगाड़ी, चमड़े के लिये मृत गाय बैल और गाय बैल के पोषण के लिये घास, भूसा जो खेती के उपउत्पाद हैं। इस प्रकार खेती पर आधारित किसान के लिये संपूर्ण गोवंश अत्यंत महत्वपूर्ण है। खेती भारतीय किसान के लिये एक पूजा है, जीवंत श्रम है, साधना है। गाय मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन का पाठ सिखाती है, वह हमें दूध जैसा उत्तम पदार्थ देती है, जो माता के दूध के बाद सर्वश्रेष्ठ आहार माना जाता है। किस जाति, धर्म या संप्

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