गौ - चिकित्सा

गौ - चिकित्सा भाग - 6 (रक्तप्रदर )

रक्तप्रदर ( ख़ून बहना )
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मादा पशु के प्रसव के चारा दाने में गड़बड़ होने से यह रोग कभी - कभी हो जाता है । उसके प्रसव के समय असावधानी रखने के कारण यह रोग हो जाता है । रोगी मादा पशु की योनि से रक्त बहता रहता है । उसमें दुर्गन्ध आती रहती है । वह रोज़ दूध में और शारीरिक शक्ति में कमज़ोर होती है ।

१ - औषधि - गाय के दूध की दही ४८० ग्राम , गँवारपाठे का गूद्दा ४८० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , सबको आपस में मिलाकर और मथकर रोगी पशु को दोनों समय उक्त मात्रा में , आराम होने तक पिलाया जाये ।

गौ - चिकित्सा भाग - 5 ( पैर रोग )

आगे के पैर की मोच ( घटने का खिसक जाना )

परस्पर लड़ने से , घातक चोट लगने से, दौड़ने और फिसल जाने पर कभी - कभी पशु की गोड़ खिसक जाती है । इसके लिए नीचे लिखें उपचार का प्रयोग करना चाहिए ।

गौ - चिकित्सा भाग - 4 ( जेर )

गाय या भैंस की जेर ( झर ) न गिरना ।
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गाय - भैंस प्रसव ( डिलिवरी ) के बाद ६-७ घन्टे बाद अपने आप जेर को बाहर डाल देती है । कमज़ोर मादा पशु की जेर कभी - कभी देर में भी गिरती है और जेर कुछ समय बाद सड़ने लगती है ।
जेर न गिरने तक , रोगी मादा पशु , सुस्त बेचैनी रहती है । चारा - दाना ठीक से नहीं खाती । उसकी योनि में से दुर्गन्ध आती है । पेशाब बार- बार और थोड़ा - थोड़ा आता है । कभी जेर छोटे- छोटे टुकड़ों में गिरती है ।

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