गौ महिमा

गाय भारत की आत्मा है।

औद्यौगिकीकरण की आंधी अभी तक इस ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ नहीं पायी थी किन्तु नई आर्थिक नीति के कारण ग्रामीण अर्थनीति को खतरा पैदा हो गया है। ये अपनी विशाल पूंजी और अचूक प्रचारशक्ति से शीघ्र ही भारतीय बाजारों पर पूर्ण अधिकार कर लेंगे और भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने में आत्मसात कर लेंगे। इस विषम परिस्थितियों में गोरक्षा नई जीवन पद्धति को दृष्टि दे सकती है। पूरी अर्थव्यवस्था के परिवर्तन की व्यापक मांग का गाय एक प्रतीक है। उसे ‘गाय बचाओ’ के रूप में देखने जैसा है। गाय भारत की आत्मा है। शरीर में जितना महत्व आत्मा का है वही महत्व गाय का भारत के जीवन में आदिकाल से रहा है और आज भी है| अभ

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यह सारी कामनायें पूर्ण करने वाली ‘‘कामधेनु’’है।

यह सारी कामनायें पूर्ण करने वाली ‘‘कामधेनु’’है।

भारत में गाय मात्र दुधारू पशु नहीं है, यह सारी कामनायें पूर्ण करने वाली ‘‘कामधेनु’’है। इससे लाखों परिवारों का पोषण होता है। डेयरी इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में ४९ हजार ग्रामीण दुग्ध उत्पादन सहकारी संगठनों के लगभग ५० लाख से ज्यादा ग्वाल परिवार प्रतिदिन ८० लाख टन दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। सन् १९८७ में दुग्ध उत्पादन ४ करोड़ टन के आसपास रहा, जो १९९५ में बढ़कर ५ करोड़ ४९ लाख टन हो गया है। दुग्ध उत्पादन में ग्वाल परिवार के अलावा सहकारी एवं निजी डेयरियां एवं गोभक्तों की बड़ी जमात सक्रिय है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का १५००० करोड़ रुपये का योगदान माना जाता है,उसमें ७०% दूध तथा

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मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है ।

मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है ।

आज भी गाय की उत्पादकता व उपयोगिता में कोई कमी नहीं आई है । केवल हमने अपनी जीवनशैली को प्राकृतिक आधार से हटाकर यन्त्राधारित बना लिया है । विदेशियों के अंधानुकरण से हमने कृषि को यन्त्र पर निर्भर कर दिया । यन्त्र तो बनने के समय से ही ऊर्जा को ग्रहण करने लगता है और प्रतिफल में यन्त्रशक्ति के अलावा कुछ भी नहीं देता । बैलों से हल चलाने के स्थान पर ट्रेक्टर के प्रयोग ने जहाँ एक ओर भूमि की उत्पादकता को प्रभावित किया है वहीं दूसरी ओर गोवंश को अनुपयोगी मानकर उसके महत्व को भी हमारी दृष्टि में कम कर दिया है । फिर यन्त्र तो ईंधन भी मांगते हैं । आज खनिज तेल के आयात के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत अ

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परमात्मा का वास्तविक स्वरुप

समुद्रोऽसि, विश्व व्यचा, अजोऽस्येक पाद हिरसि।
―(यजु. अ. 5 मंत्र 33)
भावार्थ―ईश्वर सब प्राणियों का गमनागमन करने वाला, जग व्यापक और (अज) अजन्मा है, जिसके एक पाद में विश्व है।

न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यश:।
―(यजु. अ. 32 मं. 3)
भावार्थ―हे मनुष्यों ! ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता, उसकी मूर्ति या आकृति नहीं है, उसकी आज्ञा पालन ही उसका स्मरण करना है।

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