Skahore's blog

गौ - चिकित्सा भाग - 9 ( नासूर )

नासूर ( घाव )
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यह रोग फोड़े होने पर होता है । या नस में छेद हो जाने पर होता हैं । कभी - कभी कोई हड्डी रह जाने पर भी नासूर हो जाता है । यह काफ़ी बड़ा फोड़ा हो जाता है और नस में छेद होने पर ख़ून निकलता रहता है ।

१ - औषधि - आवॅला १२ ग्राम , कौड़ी २४ ग्राम , नीला थोथा ५ ग्राम , गाय का घी ५ ग्राम , आॅवले और कचौड़ी को जलाकर , ख़ाक करके , पीसलेना चाहिए । फिर नीले थोथे को पीसकर मिलाना चाहिए । उसमें घी मिलाकर गरम करके गुनगुना कर नासूर में भर देना चाहिए ।

गौ - चिकित्सा भाग - 8 ( धनुर्वात )

धनुवति , धनुर्वात
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इस रोग में पशु बहुत अधिक सुस्त रहता है । कोई पशु लकड़ी की तरह अकड़ जाता है । और पाँव ज़मीन पर ठोंकता रहता हैं ।वह गर्दन घुमाता रहता है । इस रोग में पशु भड़कने जैसा मालूम होता है । उस की साँस तेज़ चलती हैं । साधारण : दस्त भी बन्द हो जाते हैं । बछड़ों को यह रोग होने पर वे दूध पीना बन्द कर देते हैं । पशु आधे - आधे घन्टे तक बेहोश रहते हैं । जिस ओर पशु पांँव ठोंकता हैं , उस ओर की चमड़ी के बाल भी निकल जाते हैं ।

गौ - चिकित्सा भाग - 6 (रक्तप्रदर )

रक्तप्रदर ( ख़ून बहना )
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मादा पशु के प्रसव के चारा दाने में गड़बड़ होने से यह रोग कभी - कभी हो जाता है । उसके प्रसव के समय असावधानी रखने के कारण यह रोग हो जाता है । रोगी मादा पशु की योनि से रक्त बहता रहता है । उसमें दुर्गन्ध आती रहती है । वह रोज़ दूध में और शारीरिक शक्ति में कमज़ोर होती है ।

१ - औषधि - गाय के दूध की दही ४८० ग्राम , गँवारपाठे का गूद्दा ४८० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , सबको आपस में मिलाकर और मथकर रोगी पशु को दोनों समय उक्त मात्रा में , आराम होने तक पिलाया जाये ।

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